Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 10, Verse 29

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |
पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् || 29||

अनन्तः-अनन्त; च-भी; अस्मि-हूँ; नागानाम्-फणों वाले सर्पो में; वरुण:-जलचरों के देवता; यादसाम्-समस्त जलचरों में; अहम्-मैं हूँ; पितृणाम् पितरों में; अर्यमा–अर्यमा; च-भी; अस्मि-हूँ; यमः-मृत्यु का देवता; संयमताम्-समस्त नियमों के नियंताओं में और; अहम्-मैं हूँ।

Translation

BG 10.29: विभूति योग अनेक फणों वाले सों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियामकों में मैं मृत्यु का देवता यमराज हूँ।

Commentary

अनन्त एक दिव्य सर्प है जिस पर विष्णु भगवान विश्राम करते हैं। उसके दस हजार फण हैं। ऐसा कहा गया है कि वह सृष्टि के प्रारम्भ से अपने प्रत्येक फण से निरन्तर भगवान की महिमा का गान कर रहा है किन्तु उसका वर्णन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वरुण समुद्र के देवता हैं। अर्यमा अदिति के तीसरे पुत्र हैं। दिवंगत पितरों के प्रमुख के रूप में उनकी पूजा की जाती है। यमराज मृत्यु का देवता है। वह मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा के नश्वर शरीर को ले जाता है। वह भगवान की ओर से न्याय करते हैं और मनुष्य के इस जीवन के कर्मों के अनुसार उसे अगले जन्म में दण्ड या फल प्रदान करता है। वह अपने कर्त्तव्य पालन में किसी प्रकार की कोताही नहीं करते चाहे वे जीवात्मा के लिए सुखद या पीड़ादायक ही क्यों न हो। वह निष्पक्ष परम न्यायकर्ता के रूप में भगवान की महिमा को प्रदर्शित करते है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
10. विभूति योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!